بقلم
جوهينا صالح
*********

جوهينا صالح
*********
سراب العين
ياحلوة العينين.
والحنين يناديني..
هل أخبرت الطيرعني.
فجاء مع الفجر .... بلحن..
يواسيني...!
يسليني ..يدفعني نحوالحب.
كتنين...!
وأنظر نحو عينيك..
فماذا أرى...
أقصيدة شعر؟..
أم لحن نغم ناي حزين..
أم تراني أغفو على حلم..
ويأتي الشوق...
يصحيني...
ياحزن عينيك..
يذكرني بحزني.
ويرجعني إليك..
يتركني أهيم مع الذكرى...
وأشعر كم من الأسى...
لديك...
تركت على شفةالزمن..
الصامت... الميت..
همسة حب..
دمعة حزن..
كما تركت قطرة الندى..
على زهرة الليلك...
شكوت إليك غربتي..
ولا أدري..
تموت الشكوى..
أم أناديك..
باسمك فألقى صدى..
يناجي همسي..
يردد تراتيلي..
ويواسيني..
والحنين يناديني..
هل أخبرت الطيرعني.
فجاء مع الفجر .... بلحن..
يواسيني...!
يسليني ..يدفعني نحوالحب.
كتنين...!
وأنظر نحو عينيك..
فماذا أرى...
أقصيدة شعر؟..
أم لحن نغم ناي حزين..
أم تراني أغفو على حلم..
ويأتي الشوق...
يصحيني...
ياحزن عينيك..
يذكرني بحزني.
ويرجعني إليك..
يتركني أهيم مع الذكرى...
وأشعر كم من الأسى...
لديك...
تركت على شفةالزمن..
الصامت... الميت..
همسة حب..
دمعة حزن..
كما تركت قطرة الندى..
على زهرة الليلك...
شكوت إليك غربتي..
ولا أدري..
تموت الشكوى..
أم أناديك..
باسمك فألقى صدى..
يناجي همسي..
يردد تراتيلي..
ويواسيني..
بقلمي

ليست هناك تعليقات:
إرسال تعليق